
वन्दे मातरम आपका अपना गौरव शर्मा "भारतीय" समस्त आत्मीय जनों को प्रणाम करता हूँ, आज मै "अभियान भारतीय" को बुजुर्गों से मिले आशीर्वाद और व्यापक समर्थन को विशेष रूप से आप तक पहुँचाने के लिए उपस्थित हूँ !!
"अभियान भारतीय" की टीम का स्कूलों, कालेजों के साथ ही अन्य सार्वजानिक स्थानों में जाने और जनसामान्य से लेकर गणमान्य नागरिकों से संपर्क करने का दौर प्रारंभ हो चूका है इसी कड़ी में हम बुजुर्गों का आशीर्वाद और समर्थन प्राप्त करने के लिए वृद्धाश्रम पहुंचे और वहां पर हमने "अभियान भारतीय" के उद्देश्य का जीवंत दर्शन किया |
वहां पर अपनों के सताए हुए कुछ बुजुर्गों ने हमारा स्वागत किया और हमसे हमारे आने का करण जानना चाहा इस पर हमारी टीम की वरिष्ठ सदस्य आदरणीय ममता दीदी ने उन्हें "अभियान भारतीय" के लिए उनके आशीर्वाद लेने की हमारी इच्छा के सम्बन्ध में बताया तो जैसे उनके अन्दर के दुखों और गुस्से का भाव फुट पड़ा और उनके मुह से निकल पड़ा कोई "क्या करोगे हमारा आशीर्वाद लेकर वैसे भी आजकल आशीर्वाद का मोल नहीं है" हम सभी अचानक एकदम शांत हो गए और कमरे में ख़ामोशी छा गयी और बुजुर्ग दादाजी ने फिर से बोलना प्रारंभ किया और कहा की "अगर आशीर्वाद का अपनापन का अनुभव का कोई कीमत होता तो आज हम यहाँ नहीं होते" कुछ समय तक वह इसी प्रकार अपनी बातें कहते रहे फिर न जाने उन्हें क्या सुझा अचानक खामोश हो गए और फिर बोले "अच्छा बताओ क्या है ये अभियान भारतीय" और पुनः सब खामोश हो गए और मेरी और देखने लगे {मानो कोई अब कुछ कहना न चाह रहा हो} | फिर मैंने हलके से झिझक के साथ अपने अभियान का उद्देश्य बताना प्रारंभ किया की हम भारत की जनता को जात पात के भेदभाव से मुक्त कर भारतीय बन एकता के सूत्र में पिरोने की अपील इस अभियान के माध्यम से कर रहे हैं, सभी बुजुर्गों ने बात को बड़ी ही गंभीरता से सुना, अब मेरी बात ख़त्म हो चुकी थी और उनके चेहरे पर और संतोष का भाव श्पष्ट दिखाई दे रहा था| मैंने कहा, क्यों दादाजी अब तो दोगे न हमें आशीर्वाद, तो उन्होंने मुस्कुराकर कहा "बेटा तेरा अभियान खूब सफल होगा जब हम सब बूढ़े यहाँ अलग अलग जाती धर्मों के, अलग अलग संस्कृतियों के होने के बाद भी मिलजुल कर रह सकते हैं, जब हम इसी को अपना परिवार, समाज और देश मान सकते हैं तो फिर सब जवान जाती धर्म के भेदभाव को भूलकर एक होकर क्यों नहीं रह सकते खूब सफल होगा बेटा अभियान भारतीय" दादाजी की बात सुनकर मानो हम सभी के जान में जान आई और फिर सभी ने हमें जी भर कर आशीर्वाद दिया और सन्देश पुस्तिका में एक एक के सभी अपना अपना सन्देश लिखने लगे और फिर हम उनके सन्देश प्राप्त कर वहां से लौट आये|
मै जब से वृद्धाश्रम से बाहर आया हूँ, बस यही सोच रहा हूँ की ऐसी क्या वजह है की हम अपने अपनों को, अपने जन्मदाताओं को, उनके जीवन के अंतिम समय में भी तकलीफ सहने के लिए वृद्धाश्रम में छोड़ आते हैं? क्या हमारे उस देश में जहाँ मर्यादा पुरषोत्तम श्री राम जी और श्रवण कुमार ने माता पिता की सेवा और भक्ति का आदर्श प्रस्तुत किया है वहां इन्हें थोडा सा मान सम्मान और अपनापन नहीं दे सकते ? जिस माँ बाप ने हमारे लिए जीवन भर कष्ट सहे क्या हम उनके लिए थोड़े भी कष्ट नहीं सह सकते ? क्या हमारी मानवीय संवेदना, हमारे नैतिक मूल्यों ने दम तोड़ दिया है?
"अभियान भारतीय" वृद्धाश्रम में तो वास्तव में प्रासंगिक है पर अब इसे हमें बाहर भी प्रासंगिक बनाना है हमें न केवल लोगों को जाती धर्म के भेदभाव को त्यागकर भारतीय बनने के लिए प्रेरित करना है वरन ऐसे लोग, जिनकी मानवीय संवेदना, नैतिक मूल्यों ने उनका साथ छोड़ दिया है, को फिर से उनमे जागृत करना है, एक भारतीय के मन में दुसरे भारतीय के लिए प्रेम की भावना का होना अत्यंत आवश्यक है और यही अभियान भारतीय का ध्येय भी है.................वन्दे मातरम !!